उत्तरकाशी। बाड़ागड्डी पट्टी के आराध्य देव श्री हरि महाराज का पौराणिक दुधगाडू मेला मुस्टिकसौड़ में परंपरा और आस्था के साथ संपन्न हुआ। जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर देवथात में आयोजित इस मेले में आस्था के रंग देखने को मिले। ढोल-दमाऊ की थाप और फूलों की वर्षा के बीच हरि महाराज के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा।
13 गांवों के आराध्य हैं हरि महाराज
बताया जाता है कि हरि महाराज बाड़ागड्डी पट्टी के 13 गांवों के आराध्य देव हैं। इनमें मुस्टिकसौड़, बोंगाड़ी, कुरोली, कंकराड़ी, जसपुर, सिल्याण, निरकोट, मस्ताड़ी, मानपुर, किशनपुर, बोंगा, भेलुडा, कोटी, लदाड़ी और कंसेण गांव शामिल हैं। मान्यता है कि हरि महाराज भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय के रूप हैं। इनका निवास हरिगिरी पर्वत पर माना जाता है।
हर साल अगस्त माह में इस मेले का आयोजन होता है। इस दिन ग्रामीण अपने घरों से दूध, दही, मक्खन और घी लेकर देवथात पहुंचते हैं।
दो कुंतल दूध से हुआ दुग्धाभिषेक
मेले की सबसे खास परंपरा दुग्धाभिषेक है। इस बार भी ग्रामीणों ने करीब दो कुंतल दूध से हरि महाराज का अभिषेक किया। साथ ही हरि महाराज के पाश्वा (जिस पर देवता अवतरित होते हैं) का भी दूध से स्नान कराया गया। ग्रामीणों ने अपने परिवार, खेती-बाड़ी और मवेशियों की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
पिछले कुछ वर्षों में जब सभी गांवों का दूध एकत्र होता है तो यह मात्रा 100 से 160 क्विंटल तक पहुंच जाती है। ग्रामीण इसे बटर फेस्टिवल के रूप में भी मनाते हैं।
ब्रह्मकमल और केदारपाती का मिला प्रसाद
मेले के लिए हरिगिरी पर्वत से केदारपाती और यमुनोत्री धाम के सप्तऋषि कुंड से राज्य पुष्प ब्रह्मकमल लाया जाता है। इसे हरि महाराज को अर्पित किया जाता है। इसके बाद देवता के पश्वा ने श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में ब्रह्मकमल और केदारपाती वितरित की। इसे पाकर श्रद्धालु खुद को धन्य मानते हैं।
सीटी बजाकर किया जाता है देवता का आह्वान
इस मेले से जुड़ी एक अनोखी परंपरा सीटी बजाने की है। मान्यता है कि हरि महाराज और उनके भाई हुणेश्वर देवता कालांतर में सीटी बजाकर एक दूसरे को संकेत देते थे। आज भी बिना सीटी बजाए हरि महाराज अपने पश्वा पर अवतरित नहीं होते। इसलिए श्रद्धालु सीटी बजाकर ही अपने देवता को प्रसन्न करते हैं।
दोपहर बाद मेले में रासो-तांदी और अन्य लोक नृत्यों का आयोजन हुआ। महिलाओं और युवाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में लोक नृत्य किया। पूरे दिन देव डोलियों के नाचने और ढोल-नगाड़ों की थाप से मेला स्थल गुंजायमान रहा।